सरायपाली (सिरबोड़ा)।फुलझर अंचल में गोंड पोटा गोत्र का प्राचीन रउर त्यौहार श्रद्धा, परंपरा और एकता के साथ संपन्न
फुलझर क्षेत्र, जो छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले और उड़ीसा की सीमा से लगा हुआ है, के ग्राम सिरबोड़ा में गोंड आदिवासी समाज के पोटा गोत्र का अत्यंत प्राचीन एवं पारंपरिक रउर त्यौहार 9 जनवरी 2026 को श्रद्धा, सादगी और सामाजिक एकता के साथ संपन्न हुआ। यह पर्व गोंड समाज की धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और सामूहिक जीवन मूल्यों का जीवंत प्रतीक माना जाता है।
गौरतलब है कि फुलझर अंचल के गोंड आदिवासी समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएँ आज भी मुख्यतः लोकगीतों, लोककथाओं और जनश्रुतियों के माध्यम से जीवित हैं। लिखित ग्रंथों के अभाव में रउर जैसे पारंपरिक देवस्थल और उनसे जुड़ी मान्यताएँ ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी समाज की आध्यात्मिक पहचान को आगे बढ़ा रही हैं। फुलझर क्षेत्र में गोंड समाज के प्रत्येक गोत्र का एक विशिष्ट रउर (देवस्थल) होता है, जहां उनके इष्ट देवी-देवताओं का वास माना जाता है।
रउर उत्सव : परंपरा और आस्था का संगम
रउर पर्व के अवसर पर समाज के वरिष्ठजनों एवं पारंपरिक पदाधिकारियों की उपस्थिति में पीढ़ियों से चली आ रही पूजा पद्धति के अनुसार धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किए गए। देवी-देवताओं का आवाहन कर ग्राम, समाज एवं क्षेत्र की सुख-समृद्धि और शांति की कामना की गई। पूरे परिसर में आध्यात्मिक वातावरण व्याप्त रहा।
रउर त्यौहार में बूढ़ादेव को प्रमुख इष्टदेव के रूप में श्रद्धापूर्वक स्मरण किया गया। साथ ही समाज में पूज्य अन्य देवी-देवताओं की भी पारंपरिक विधि से पूजा-अर्चना की गई। सभी अनुष्ठान गोंड समाज की प्राचीन मर्यादाओं के अनुरूप सम्पन्न हुए।
सामूहिक भोग एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम
धार्मिक अनुष्ठानों के पश्चात पारंपरिक भोग एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। इन कार्यक्रमों के माध्यम से गोत्रीय परंपराओं, देवी-देवताओं और सामाजिक मूल्यों से नई पीढ़ी को परिचित कराया गया। भोग-प्रसाद का वितरण सामूहिकता और समानता के भाव के साथ किया गया।
छतर भोज में गोत्र इतिहास का स्मरण
10 जनवरी 2026 को आयोजित छतर भोज कार्यक्रम में पोटा गोत्र के इतिहास, गढ़-देवगढ़, चंदा तथा गोत्रीय उत्पत्ति से जुड़ी पारंपरिक कथाओं का विस्तार से वर्णन किया गया। यह आयोजन युवाओं और बच्चों को अपने पूर्वजों, संस्कृति और जड़ों से जोड़ने का सशक्त माध्यम बना।
हजारों की सहभागिता
इस आयोजन में छत्तीसगढ़ एवं उड़ीसा के सीमावर्ती क्षेत्रों—फुलझर राज, बोडा सांभर, कौड़िया राज, देवरी, खलसा राज सहित लगभग 100 गांवों से हजारों की संख्या में महिला, पुरुष, बच्चे और बुजुर्ग शामिल हुए। सभी ने पारंपरिक वेशभूषा में सादगी और अनुशासन के साथ कार्यक्रम में भाग लेकर सामाजिक एकता का परिचय दिया।
आयोजन की समस्त व्यवस्थाएँ पोटा गोत्र के लोगों द्वारा सामूहिक सहयोग एवं चंदा से की गईं। सभी सहभागीजन के लिए प्रसाद, भोजन, नाश्ता एवं चाय की व्यवस्था रही।
सामाजिक एकता का प्रतीक पर्व
रउर त्यौहार गोंड आदिवासी समाज के लिए केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, भाईचारे और सांस्कृतिक चेतना का पर्व है। आयोजकों ने बताया कि यह ऐतिहासिक आयोजन परंपरा अनुसार आगामी वर्ष 2028 में पुनः आयोजित किया जाएगा।
कार्यक्रम को सफल बनाने में पोटा गोत्र के देहा श्री लगन साय सिदार, सहयोगी पार्थव सिदार, बीसी श्री सीताराम, छतरिया श्री विजयपाल सिदार, कुमर्रा श्री ललित सिदार (चक प्रभारी) सहित समाज प्रमुख क्षेत्रो लाल सिदार, घनश्याम सिदार, गुरुदयाल पालेश्वर एवं वीरेंद्र सिदार का विशेष योगदान रहा। कार्यक्रम का संचालन एवं माइक व्यवस्था श्री श्रवण सिदार एवं साधव सिदार द्वारा की गई।यह आयोजन यह संदेश देता है कि आधुनिकता के दौर में भी गोंड आदिवासी समाज अपनी प्राचीन परंपराओं, प्रकृति-पूजन और सामूहिक जीवन मूल्यों को पूरी निष्ठा के साथ जीवित रखे हुए है।



