एक मां की संघर्ष, संस्कार व संकल्प की प्रेरक गाथा

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बसना । मां की आंखों में अपने बच्चों के लिए पलने वाले सपने अक्सर शब्दों से कहीं बड़े होते हैं। उन सपनों को साकार करने के लिए वह कितने संघर्ष, कितने त्याग और कितनी तपस्या करती है, इसका अंदाजा तब होता है जब उन सपनों की चमक सफलता बनकर सामने आती है। विश्व मदर्स डे के अवसर पर बसना अंचल से एक ऐसी ही प्रेरक कहानी सामने आई है, जो यह साबित करती है कि यदि मां के इरादे मजबूत हों तो सीमित संसाधन भी बच्चों की उड़ान को रोक नहीं सकते।

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वनांचल ग्राम बड़ेसाजापाली की साधारण ग्रामीण महिला रामप्यारी साहू जो स्वयं केवल पांचवीं तक शिक्षा प्राप्त की है, लेकिन अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाने का ऐसा संकल्प लिया कि आज उनकी स चार बेटियां छत्तीसगढ़ के विभिन्न शासकीय विद्यालयों में शिक्षिका के रूप में सेवाएं दे रही हैं, जबकि सबसे छोटी बेटी कुमारी नंदिनी साहू बस्तर संभाग के – जगदलपुर में डिप्टी कलेक्टर बनकर पूरे – क्षेत्र का नाम रोशन कर रही हैं।

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कहते हैं कि मां ही बच्चे की पहली गुरु होती है। उसकी सीख, उसके संस्कार और उसका विश्वास ही बच्चों के जीवन की दिशा तय करते हैं। रामप्यारी साहू ने इस कहावत को अपने जीवन से चरितार्थ कर दिखाया। भले ही उनकी औपचारिक शिक्षा पांचवीं तक सीमित रही, लेकिन शिक्षा के महत्व को उन्होंने गहराई से समझा और यही सोच अपने बच्चों में भी रोपी।

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श्रीमती राम प्यारी के साहू ने बताया कि ग्राम नगरदा रे (बिलाईगढ़) क्षेत्र के एक छोटे से गांव में क पली-बढ़ी और केवल पांचवीं तक पढ़ी हैं की। रामप्यारी साहू का विवाह शिक्षक मेघनाथ स साहू के साथ हुआ। विवाह के बाद वे ग्राम । बड़ेसाजापाली आईं। साधारण ग्रामीण ने परिवेश, लघु कृषक परिवार, सीमित ही संसाधन और कम शिक्षा के बावजूद उनके क मन में एक ही विश्वास था कि शिक्षा ही वह को शक्ति है जो जीवन की हर कठिन राह को व आसान बना सकती है। समय के साथ

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परिवार बड़ा हुआ। घर में पांच बेटियां और दा एक बेटा हुआ। पति शिक्षक थे, इसलिए घर में में शिक्षा का वातावरण था। लेकिन ग्रामीण हैं जीवन की कठिनाइयों और सीमित साधनों व्य के बीच इतने बड़े परिवार का पालन-पोषण म आसान नहीं था। इसके बावजूद रामप्यारी ग साहू ने कभी बच्चों की पढ़ाई को बोझ नहीं बनने दिया।

वे अक्सर अपने बच्चों से कहा करती न्ह थी कि “हम भले कम पढ़े हैं, लेकिन हमारे को बच्चे जरूर आगे बढ़ेंगे।” रामप्यारी साहू की व्य बेटियां रूपेश्वरी साहू, जीतेश्वरी साहू, मंटू साहू, मेनका साहू और नंदिनी साहू, तथा सबसे छोटे पुत्र नीलकंठ साहू के पालन-पोषण एवं संस्कार देने में उन्होंने मेहनत, त्याग और समर्पण का परिचय दिया।

वर्ष 2015 में उनके पति मेघनाथ साहू का निधन हो गया। परिवार की सारी जिम्मेदारी रामप्यारी साहू के कंधों पर आ गई। उस समय कई लोगों को लगा कि अब इतने बड़े परिवार में बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो सकती है, लेकिन उन्होंने परिस्थितियों के सामने हार नहीं मानी ।

ग्रामीण अंचल की यह प्रेरक कहानी यह संदेश देती है कि यदि माता-पिता बच्चों को शिक्षा, सही मार्गदर्शन और मजबूत संस्कार दें, तो सीमित संसाधन भी सफलता की राह में बाधा नहीं बनते। लेकिन उन्होंने अपने बच्चों को जीवन का सबसे बड़ा पाठ सिखाया। राम प्यारी अपने बच्चों से हमेशा कहती हैं कि मेहनत, विश्वास और सपनों को कभी छोटा मत समझो। सपनों को धरातल पर उतारने का निरंतर प्रयास करो ।

विश्व मदर्स डे पर रामप्यारी साहू की यह प्रेरक यात्रा हर मां को सलाम करने का अवसर देती है और यह साबित करती है कि एक मां का विश्वास, त्याग और हौसला बच्चों को आसमान की ऊंचाइयों तक पहुंचा सकता है।

मां के संघर्ष त्याग और विश्वास की जीत

पति के 2015 में निधन के बाद आंखों में आंसू दिल में अपने बच्चों के भविष्य को संवारने का अटूट संकल्प। उन्होंने विषम परिस्थितियों में बच्चों को संभाला और हमेशा यही कहा कि तुम लोग पढ़-लिखकर आगे बढ़ो, यही तुम्हारे पिता के सपनों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।” मां के इसी विश्वास और प्रेरणा से चारों बेटियाँ शिक्षक बन गई। मां की प्रेरणा ने सबसे छोटी बेटी नंदिनी साहू के मन में बड़ा सपना जगाया।मां के संघर्ष और उनके अटूट विश्वास ने संघर्ष, त्याग व विश्वास की जीत नंदिनी को लगातार आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने मेहनत, लगन और दृढ़ संकल्प के साथ पढ़ाई जारी रखी और अंततः वह मुकाम हासिल किया। जिसका सपना कभी उनकी मां और पिता ने देखा था। आज चारों बेटियां शिक्षिका के रूप में नई पीढ़ी को शिक्षित कर रही हैं और नंदिनी साहू डिप्टी कलेक्टर बनकर प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभा रही हैं, छोटा पुत्र झारखंड में यूपीएससी की तैयारी कर रहा है। यह सफलता केवल 5 बेटियों एवं एक बेटा की नहीं, बल्कि उनकी मां रामप्यारी साहू के संघर्ष, त्याग, संस्कार और अटूट विश्वास की जीत है।