Wednesday, March 18, 2026
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छत्तीसगढ़ -: जहां मां सीता ने की थी रेत के शिविलिंग की पूजा, वहीं खड़ा है 8 वीं सदी का मंदिर

छत्तीसगढ़ -: जहां मां सीता ने की थी रेत के शिविलिंग की पूजा, वहीं खड़ा है 8 वीं सदी का मंदिर छत्तीसगढ़ को भगवान राम के वनवास काल के पथगमन मार्ग के रूप में चिह्नित किया गया है और इस तथ्य को प्रमाणित करते     हुए कई अवशेष यहां मौजूद हैं। इन्हीं में से एक प्रतीक है राजिम का कुलेश्वर महादेव मंदिर। महानदी, पैरी और सोंढूर नदियों के त्रिवेणी संगम पर स्थित इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि जिस जगह मंदिर स्थित है, वहां कभी वनवास काल के दौरान मां सीता ने देवों के देव महादेव के प्रतीक रेत का शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा की थी। आज जो मंदिर यहां मौजूद है उसका निर्मांण आठवीं शताब्दी में हुआ था।कहा जाता है कि नदियों के संगम पर मौजूद इस मंदिर के अंदर एक गुप्त गुफा मौजूद है जो नजदीक ही स्थित लोमस ऋषि के आश्रम तक जाती है। कल से सावन शुरू हो रहा है अब इस ऐतिहासिक मंदिर में भगवान कुलेश्वर   महादेव के दर्शन के लिए भक्तों का तांता लगेगा। बारिश के बाद तीनों नदियों का जलस्तर काफी ऊपर है और मंदिर पानी से घिरा हुआ है, लेकिन महादेव पर आस्था रखने वाले भक्त नाव के सहारे उनके दर्शन के लिए मंदिर तक जाएंगे। स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना, हैरान कर देती है नींव की मजबूती

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राजिम के त्रिवेणी संगम के बीच में वर्षों से टिका कुलेश्वर महादेव मंदिर स्थापत्य का बेजोड़ नमूना है। करीब 1200 साल पहले बना यह मंदिर प्राचीन भवन निर्माण तकनीक का अनोखा उदाहरण है। तीन नदियों के संगम पर स्थित होने के कारण यहां बारिश के दिनों में नदियां पूरी तरह आवेग में   होती हैं। इसके बीच अपनी मजबूत नींव के साथ मंदिर सदियों से टिका हुआ है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से मात्र 45 किलोमीटर दूर स्थित राजिम में नदी पर बना पुल 40 साल भी नहीं टिक पाया, जबकि वहां आठवीं सदी का कुलेश्वर महादेव मंदिर आज भी खड़ा है। जैसे ही शिवलिंग को छूता है बाढ़ का पानी… मंदिर का दर्शन करने देशभर से लोग यहां पहुंचते हैं। राजिम में नदी के एक किनारे पर भगवान राजीवलोचन का मंदिर है और बीच में कुलेश्वर महादेव का मंदिर। किनारे पर एक और महादेव मंदिर है, जिसे मामा का मंदिर कहा जाता है। कुलेश्वर महादेव मंदिर को भांजे का मंदिर कहते हैं।    किंवदंती है कि बाढ़ में जब कुलेश्वर महादेव का मंदिर डूबता था तो वहां से मामा बचाओ आवाज आती है। इसी मान्यता के कारण यहां आज भी नाव पर मामा-भांजे को एक साथ सवार नहीं होने दिया जाता है। नदी किनारे बने मामा के मंदिर के शिवलिंग को जैसे ही नदी का जल छूता है उसके बाद बाढ़ उतरनी शुरू हो जाती है।  तराशे गए पत्थरों से बना है विशाल मंदिर मंदिर का आकार 37.75 गुना 37.30 मीटर है। इसकी ऊंचाई 4.8 मीटर है मंदिर का अधिष्ठान भाग तराशे हुए पत्थरों से बना है। रेत एवं चूने के गारे से चिनाई की गई है। इसके विशाल चबूतरे पर तीन तरफ से सीढ़ियां बनी हैं। इसी चबूतरे पर पीपल     का एक विशाल पेड़ भी है। चबूतरा अष्टकोणीय होने के साथ ऊपर की ओर पतला होता गया है। मंदिर निर्माण के लिए लगभग 2 किलोमीटर चौड़ी नदी में उस समय निर्माताओं ने ठोस चट्टानों का भूतल ढूंढ निकाला था। यह मंदिर और राजिम अब कुंभ के रूप में प्रसिद्ध हो चला है। अब यहां देशभर के साधु-संत इकठ्ठा होते हैं।

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