Saturday, August 30, 2025
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छत्तीसगढ़ की ऐसी अदालत, जहां भगवान की होती है पेशी, देवी देवताओं को मिलती है सजा ! कौन होते हैं वकील और जज?

छत्तीसगढ़ की ऐसी अदालत, जहां भगवान की होती है पेशी, देवी देवताओं को मिलती है सजा ! कौन होते हैं वकील और जज?

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Tribal Culture: क्या आपने कभी सोचा है कि देवी-देवता भी अदालत के कटघरे में खड़े हो सकते हैं? बस्तर के भंगाराम देवी मंदिर में एक ऐसी ही अनोखी परंपरा है, जहां लोगों की शिकायतों पर देवी-देवताओं को सजा दी जाती है।

छत्तीसगढ़ का आदिवासी बहुल बस्तर क्षेत्र अक्सर नक्सलियों और उनकी अदालतों के कारण सुर्खियों में रहता है। इन अदालतों में माओवादी अपने खिलाफ काम करने वालों को सजा देते हैं। हालांकि, बस्तर में एक और अदालत है, जिसकी बैठक साल में एक बार होती है। राजधानी रायपुर से करीब 250 किलोमीटर दूर बस्तर संभाग के कोंडागांव जिले के केशकाल में एक अनोखी अदालत लगती है।

यहां की आदिवासी आबादी करीब 70 प्रतिशत है। गोंड, मारिया, भतरा, हल्बा और धुरवा जैसी जनजातियां यहां निवास करती हैं। इनकी परंपराएं अब भी दुनिया के लिए अनसुनी हैं, लेकिन बस्तर की समृद्ध विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इन्हीं में से एक परंपरा है “जन अदालत” यानी लोगों की अदालत, जो हर साल मानसून के दौरान भादो यात्रा उत्सव में भंगाराम देवी मंदिर में लगती है।

भगवान को क्यों देते हैं सजा?

यहां की जनजातियां अपने देवताओं पर असीम आस्था रखती हैं। सदियों से किसी भी प्राकृतिक आपदा, बीमारी या फसल खराब होने पर लोग ग्राम देवताओं की शरण में जाते हैं। लेकिन, बस्तर की इस अनूठी परंपरा में अगर देवी-देवता ग्रामीणों की प्रार्थना नहीं सुनते, तो उन्हें भी दोषी ठहराया जाता है।

भादो महीने के अंतिम सप्ताह में केशकाल का जोरता उत्सव धूमधाम से मनता है। यहां की प्रमुख देवी भंगाराम देवी हैं, जो नौ परगना के 55 गांवों के हजारों देवी-देवताओं की प्रमुख आराध्य मानी जाती हैं। हर साल सभी देवताओं को यहां उपस्थिति दर्ज करानी होती है।

सजा में क्या होता है?

तीन दिवसीय उत्सव के दौरान भंगाराम देवी मंदिर में मुकदमे चलते हैं। शिकायतकर्ता ग्रामीण होते हैं, आरोप देवताओं पर और गवाह होती हैं मुर्गियां। शिकायतें — खराब फसल, लंबी बीमारी या प्रार्थना करने के बाद भी मदद न मिलने जैसी।

सजा बेहद कठोर मानी जाती है। दोषी पाए गए देवताओं को निर्वासन दिया जाता है। उनकी मूर्तियों को मंदिर से निकालकर पिछवाड़े या कभी-कभी पेड़ के नीचे रख दिया जाता है। यह सजा कभी जीवन भर की भी हो सकती है, जब तक देवता अपना “व्यवहार सुधार” नहीं लेते।

इस सुनवाई को देखने के लिए करीब 240 गांवों के लोग इकट्ठा होते हैं। इस दौरान बड़े स्तर पर भोज का आयोजन भी होता है।

मुक्ति का एक मौका

यह मुकदमा सिर्फ सजा देने के लिए नहीं है, बल्कि सुधार का अवसर भी है। अगर निर्वासन में रहने के बाद देवता लोगों की प्रार्थनाओं का उत्तर देने लगते हैं, तो उन्हें फिर से मंदिर में स्थापित किया जाता है।

इतिहासकार घनश्याम सिंह नाग बताते हैं, “यह परंपरा देवताओं और मनुष्यों के पारस्परिक संबंध का प्रतीक है। यदि देवता लोगों की रक्षा नहीं करते, तो उन्हें भी न्याय के कटघरे में खड़ा किया जाता है।”

भंगाराम मंदिर समिति के सदस्य फरसू सलाम कहते हैं, “अगर ग्रामीण मानते हैं कि देवता उनकी समस्याओं का समाधान नहीं कर रहे, तो उन्हें यहां मुकदमे के लिए लाया जाता है। यह साल में एक बार होता है।”

कौन होते हैं वकील और जज?

गांव के प्रतिष्ठित लोग इस दिव्य अदालत में वकील का काम करते हैं। गवाह के तौर पर एक मुर्गी लाई जाती है और मुकदमे के बाद उसे आज़ाद कर दिया जाता है।

सजा सुनाने वाला गांव का ही एक शख्स होता है, जिसे भंगाराम देवी का प्रवक्ता माना जाता है। आरोपी देवताओं की मूर्तियों को बाहर रखा जाता है, लेकिन उन पर लगी सोने-चांदी की सजावट नहीं हटाई जाती।

आज तक इन मूर्तियों के चोरी होने की कोई घटना दर्ज नहीं हुई है, क्योंकि ग्रामीण मानते हैं कि ऐसा करने पर दैवीय न्याय मिलेगा।

मंदिर में बाकायदा एक रजिस्टर भी रखा जाता है, जिसमें कितने देवता उपस्थित हुए, कितनों पर मुकदमा चला और कितनों को दंडित किया गया — सब दर्ज होता है।

कवयित्री पूनम वासम कहती हैं, “यह एक सामाजिक व्यवस्था है। जैसे मनुष्य अपने कर्तव्य निभाने को बाध्य हैं, वैसे ही देवता भी लोगों की रक्षा और मदद के लिए जिम्मेदार हैं। यदि वे विफल होते हैं, तो उन्हें भी सजा मिलती है।”

कौन थीं भंगाराम देवी?

बस्तर की प्रत्येक जनजाति के अपने देवी-देवता हैं। लोककथाओं के अनुसार, कई देवता पहले इंसान थे, जिन्हें अच्छे कार्यों के कारण दिव्यता प्राप्त हुई।

स्थानीय मान्यता है कि भंगाराम देवी सदियों पहले तेलंगाना के वारंगल से बस्तर आई थीं। उनके साथ नागपुर से “डॉक्टर खान” भी आए थे, जिन्होंने हैजा और चेचक के प्रकोप के समय आदिवासियों की सेवा की थी।

कहा जाता है कि मंदिर का निर्माण 19वीं शताब्दी में राजा भैरमदेव के शासनकाल में हुआ। समय के साथ डॉ. खान भी देवता बन गए और आज ग्रामीण उन्हें “काना डॉक्टर” कहते हैं।

अस्वीकरण

महाजनपद न्यूज़ का मकसद केवल यह बताना है कि ये परंपराएं बस्तर की विशिष्ट सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा हैं। बस्तर सिर्फ नक्सलवाद के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए भी जाना जाता है।

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