सरायपाली न्यूज़ -: दो दिवसीय प्रशिक्षण में शिक्षकों ने सीखी खिलौनों की सहायता से अध्यापन की विधि- खिलौना आधारित शिक्षण के लिए जादुई पिटारा व खिलौना निर्माण का जोन स्तरीय दो दिवसीय कार्यशाला सह प्रशिक्षण जोन सरायपाली के छः जोन पुराना विज्ञान महाविद्यालय सरायपाली, हा. से. स्कूल डुडुमचुंवा, हाई स्कूल सिंघोड़ा, कन्या उच्च प्राथ. शाला तोषगांव, उच्च प्राथ. शाला बलौदा,उच्च प्राथ. शाला लांती में आयोजित किया गया। इस कार्यशाला में विकासखंड के 39 संकुल के कुल 249 सहायक शिक्षकों व प्रधानपाठकों ने भाग लिया।
मास्टर ट्रेनर पुष्पा पारेश्वर, ज्योति लता साहू, सुंदरलाल डड्सेना, बनमोती भोई, निर्मल मेहेर, शीला विश्वास, निरुपमा देवता,योगेश साहू ,अंजू पटेल, स्नेहलता तांडी, दुर्वादल दीप,वर्षा नंद ,राधेश्याम चौहान ने बताया कि प्राथमिक स्तर पर आधारभूत शिक्षण के जटिल विधियों के स्थान पर खेल-खेल में शिक्षण पद्धति को अपनाकर सरलता से अध्यापन कार्य किया जा सकता है। इसके लिए आधुनिक विज्ञान के युग में प्रचलित स्वनिर्मित खिलौनों की सहायता भी ली जा सकती है।साथ ही NEP 2020,निपुण भारत कार्यक्रम,FLN और खिलौना आधारित शिक्षण शास्त्र की महत्ता का प्रतिपादन किया।प्रथम दिवस कार्यक्रम की शुरुवात विकासखंड शिक्षा अधिकारी प्रकाशचंद्र मांझी,बीआरसीसी सतीश स्वरूप पटेल और 39 संकुल के समन्वयकों की उपस्थिति में किया गया।कार्यक्रम को संबोधित करते हुए बीइओ प्रकाशचंद्र मांझी ने खिलौना आधारित शिक्षण शास्त्र और स्कूलों में ई-जादुई पिटारा कैसे बनाएं पर प्रकाश डाला।बीआरसीसी सतीश स्वरूप पटेल ने खेल खिलौना और शिक्षण में उसके लाभ की महता को प्रतिपादित किया।
प्रशिक्षण के द्वितीय दिवस डीएमसी महासमुंद कमलनारायण चंद्राकर और एपीसी संपा बोस का आगमन हुआ।कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डीएमसी कमल नारायण चंद्राकर ने विभागीय गतिविधियों के संबंध में जानकारी देते हुए खिलौना निर्माण के संबंध में विचार रखे।एपीसी संपा बोस ने शिक्षण में खेल खिलौनों का महत्व प्रतिपादित करते हुए।सभी स्कूलों में जादुई पिटारा और खिलौना कार्नर बनाने की अपील की।उन्होंने बताया कि अलग-अलग मौसम में बच्चों के खिलौने भी अलग-अलग होते हैं।उन्होंने बांटी,गुल्ली डंडा और कागज की नाव का उदाहरण भी दिया।
मास्टर ट्रेनरों ने प्रशिक्षार्थियों को पांच-पांच समूह में विभाजित कर रोचक गतिविधियों के माध्यम से खिलौना निर्माण और उनके प्रयोग के गुर सिखाए।पांच समूहों ने पृथक-पृथक अपने प्रोजेक्ट का प्रदर्शन किया जिसमें से कठपुतली निर्माण,टंग्राम,मुखौटा से वन्य जीव संरक्षण नाटिका,क्रॉफ्ट निर्माण की गतिविधियां उल्लेखनीय और प्रशंसनीय रही।जोन प्रभारी सुशील चौधरी, किशोर पटेल, छबिलाल पटेल, ऋषि प्रधान, लाल भूषण पाढ़ी, सच्चिदानंद भोई, चंद्रहास पात्र, किशोर पंडा, हारून गार्डिया, हेमचंद पटेल, जय नारायण पटेल, गिरधारी पटेल संकुल समन्वयकों ने खिलौनों के कक्षा स्तर पर उपयोग से शिक्षण विधि को सरल और प्रभावी बनाने पर जोर दिया।जोन प्रभारी किशोर पटेल संकुल समन्वयक कनकेवा ने संबोधित करते हुए बालवाड़ी व कक्षा पहली से तीसरी के विद्यार्थियों के अध्यापन में खिलौनों की उपयोगिता पर प्रकाश डाला।इस प्रशिक्षण में देवानंद नायक संकुल समन्वयक केंदुढार,पाल सिंह बंजारे बैदपाली,श्रवण कुमार प्रधान संकुल समन्वयक कन्या सरायपाली,भोलानाथ नायक, नरेश नायक संकुल समन्वयक सहित स्कूलों के शिक्षकगण उपस्थित रहे।

महासमुंद सीट से उन्हें टिकट देने को लेकर यह भी कहा जा रहा है कि विधानसभा चुनाव में एंटी इनकंबेंसी उनके हार का कारण बनी, दुर्ग से लोकसभा चुनाव और फिर विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करने के बाद इस सीट में सत्ता विरोधी लहर चली और इस लहर से ताम्रध्वज साहू को हार मिली. यही वजह है कि कांग्रेस के आलाकमान ने उन्हें महासमुंद लोकसभा सीट से चुनावी मैदान में उतारा है.
सामान्य सीट होने के बावजूद महासमुंद लोकसभा क्षेत्र में ओबीसी वर्ग की जनसंख्या ज्यादा है, यही वजह है कि भाजपा के साथ-साथ कांग्रेस ने भी जाति समीकरण को ध्यान में रखकर ताम्रध्वज साहू को टिकट दिया है जो की ओबीसी वर्ग से आते हैं और इस वर्ग के लोगो मे अपनी काफी अच्छी पकड़ रखते हैं.
और प्राचीन मंदिरों के प्रसिद्ध है. जिले में चूना पत्थर और ग्रेनाइट की खानें हैं और अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से पत्थरों की कटाई-पॉलिशिंग और धान उत्पादन पर निर्भर करती है. महासमुंद जिले का गठन 6 जुलाई 1998 में हुआ था, इसके पहले यह रायपुर जिले का हिस्सा था.
(khallari mata temple)। मान्यता है कि ये मंदिर महाभारत काल से भी पुराना है। ये मंदिर एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। इस स्थान के आस-पास ऐसे अनेक प्रमाण है, जो बताते हैं कभी पांडवों ने यहां निवास किया था। आगे जानिए खल्लारी माता मंदिर और इस क्षेत्र से जुड़ी कुछ खास बातें…
पहुँचने के लिए लगभग 850 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। यहां छोटी खल्लारी माता और बड़ी खल्लारी माता के दिव्य मंदिर हैं। ऐसा मान्यता है कि भीम और हिंडिंबा का विवाह इसी मंदिर में हुआ था। क्षेत्र के लोग मां खल्लारी को अपना रक्षक मानते है। ये पूरा इलाका हरियाली से भरा हुआ है।
निर्माण कराया गया। इसके बाद समय-समय पर यहां निर्माण कार्य होते रहे। सन् 1985 में सर्वप्रथम नवरात्रि मे ज्योति कलश प्रज्जलित करना प्रारंभ हुआ जिनकी संख्या 11 है। धीरे-धीरे इसकी संख्या में वृद्धि हुई और आज हजारों की संख्या में यहां मनोकामनाएं ज्योति प्रज्जवलित किया जाता है।
निशान बने थे। इसके अलावा यहां भीम चूल्हा आदि भी देखा जा सकता है। यहां नाव के आकार का विशाल पत्थर है, जिसे भीम की नाव भी कहा जाता है। कैसे पहुंचें? 
बाघ ने पीढ़ी बांध के पास गाय को शिकार बनाने की खबर है वही आज खबर मिल रहा है की वही सोसल मिडिया से मिली जानकारी के